इंसाफ | And Justice for All…
— धन्यवाद
यह कहानी है एक ऐसे इंसान की जिसने अपनी जिंदगी के 29 साल एक ऐसे अपराध की सजा भुगतने में निकाल दिए, जो शायद उसने किया ही नहीं था। और अगर किया भी होता, तो क्या इतनी छोटी रकम के लिए इतनी लंबी सजा उचित थी?
यह कहानी है कानपुर के हरजिंदर नगर निवासी उमाकांत मिश्रा की, जिन्होंने 57.60 रुपये की कथित चोरी के आरोप में अपनी जिंदगी के 29 साल अदालतों के चक्कर लगाते हुए बिताए। 23 जुलाई 1984 को उमाकांत हरजिंदर नगर पोस्ट ऑफिस में काम करते थे। उन पर 57 रुपये 60 पैसे के गबन का आरोप लगाया गया और उन्हें नौकरी से निलंबित कर दिया गया।
Story of Umakant Mishra’s 29-year legal battle“उस दिन मुझे कुल 697 रुपये 60 पैसे दिए गए थे, जिन्हें मुझे मनी ऑर्डर के जरिए लोगों तक पहुंचाना था। मैंने 300 रुपये के मनीऑर्डर बांटे और बाकी रकम पोस्ट ऑफिस में वापस जमा कर दी। शाम को हिसाब-किताब के दौरान 57 रुपये 60 पैसे कम पाए गए। मुझ पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया और नौकरी से निकाल दिया गया। मेरे खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई।”
उमाकांत को धोखाधड़ी के आरोप में जेल भेज दिया गया। हालांकि उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन इसके बाद उनकी जिंदगी की असली लड़ाई शुरू हुई। जब उन्हें सस्पेंड किया गया, तब उनकी उम्र केवल 30 साल थी। अगले 29 वर्षों तक उन्हें कुल 348 बार अदालत में पेश होना पड़ा। आखिरकार अदालत ने सबूतों के अभाव में उन्हें निर्दोष घोषित कर दिया, लेकिन तब तक वे लगभग सब कुछ खो चुके थे।
“मैं तीन साल पहले रिटायर हुआ और 26 साल तक निलंबित रहा। मैंने 348 बार कोर्ट की सुनवाई अटेंड की। मुझे अपना कानपुर का घर बेचना पड़ा और बाद में हरदोई की जमीन भी बेचनी पड़ी। हम पूरी तरह बर्बाद हो गए।”
उनकी पत्नी गीता कहती हैं:
“हम कोर्ट के फैसले से खुश हैं, लेकिन अगर हमें समय पर न्याय मिला होता तो हमारे बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होता। हमने 29 साल तक कलंक और आर्थिक तंगी झेली। हमें बच्चों की पढ़ाई और शादी के लिए उधार लेना पड़ा। हमारी बेटियों की शादी के लिए लोगों से मदद मांगनी पड़ी। हम अपने बच्चों को ठीक से पढ़ा भी नहीं सके।”
उनके बेटे गंगाराम दिल की बीमारी से पीड़ित हैं और उनकी सर्जरी का खर्च लगभग पांच लाख रुपये है। परिवार की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है।
“हमारे पास बिल्कुल पैसे नहीं हैं। हम अपने बच्चे को मरते हुए देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते, जैसे हमने अपने बाकी तीन बच्चों को खो दिया।”
निलंबन के बाद उमाकांत को सरकार की तरफ से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली, जबकि वे निर्वाह भत्ते के हकदार थे। पैसों की कमी के कारण उनकी तीन साल की बेटी निक्कू की डायरिया से मृत्यु हो गई। बाद में उन्होंने अपने दो बेटों — दयाशंकर और दुर्गेश — को भी टीबी और निमोनिया के कारण खो दिया।
आज उमाकांत और गीता मजदूरी और छोटे-मोटे काम करके किसी तरह जीवन चला रहे हैं। वे सरकार से अपनी बकाया सैलरी, पेंशन और बेटे गंगाराम के लिए नौकरी की मांग कर रहे हैं।
Mr. Umakant Mishra, a resident of Harjinder Nagar, Kanpur, spent 29 years fighting a legal battle over an alleged theft of just 57.60 rupees. He was suspended from his post office job in 1984 and attended 348 court hearings before finally being declared innocent due to lack of evidence.
During these decades, his family suffered extreme financial hardship. They sold their home and agricultural land, lost multiple children due to lack of medical treatment, and survived by doing labour work and odd jobs.
The story highlights the devastating impact of delayed justice and how legal struggles can destroy entire families emotionally, socially, and financially.
SonyLiv:
www.sonyliv.com/watch/thriller-ep-325-december-27-2013
YouTube:
www.youtube.com/watch?v=eFSuB2p3-18
